Thursday, November 18, 2021

आओ दर्द का बटवारा कर ले

आओ दर्द का बटवारा कर ले 


एक संवाद संवेदनाओं को झकझोर देता है 

कहानी सुनाने और सुनने वाले 

बैठते हैं एक मेज पर 

फिर बात करते हैं 

आत्मीयता की 


हर एक मनुष्य एक स्थिति से निकला है 

वह उसे परखता है 

समझता है और फिर समझता है 

यही संवाद है और देखने का नजरिया


ऐसी ही कहानियों में 

कुछ सच्चे मन से सुनाई जाती 

हृदय को छू लेती हैं 

और हम शायद रो पड़ते हैं 


कुछ लोग रोने आते हैं, संग में  

दुसरे शहरों से 

दुसरे देशों से 

या दूसरी सभ्यताओं से 


हमारे सोचने के तरीके 

भिन्न हैं 

चरित्र भिन्न हैं 

और वेदनाएं भी भिन्न है 



यह सब की कहानी है 

एक लड़का और उसकी दोस्त 

एक मेज पर बैठकर  

वाचन कर रहें हैं वेदना का 


चाहे आप कितने भी कुटिल हो 

कितने भी आत्मसात 

यह सब की कहानी है 

और यही शायद मानवीयता भी 

Friday, October 1, 2021

कुछ लाइब्रेरी

उत्सुकता धीरे धीरे इंसान के अंदर जन्म लेती है 
मैं उस समय बड़ा हो रहा था 
किसी ने बताया के हमारे कस्बे में कुछ लाइब्रेरी हैं 
मैं कभी कभी एक लाइब्रेरी मैं जाने लगा 
शाम के समय कुछ वक्त लाइब्रेरी मैं गुजर जाता 

एक कमरे की छोटी सी लाइब्रेरी थी 
कुछ अलमारियाँ के साथ 
करीने से रखी किताबें 

उन्मे से मैंने एक की शुरूवात की 
समय का संक्षप्त इतिहास    
 किसी विदेशी लेखक का हिन्दी अनुवाद था 

कभी कभी पढ़ते पढ़ते नींद आ जाती 
तो कोई उठा दिया करता

फिर मेरा स्कूल दूर हो गया 
रास्ते मैं एक अंग्रेजों के जमाने का चर्च था 
पहाड़ की चोटी पर 
जहां से एक पगडंडी स्कूल के लिए छोटा रास्ता बनती थी 

उस चर्च को लोगों ने लाइब्रेरी बना दिया था 
उस चर्च मैं एक फौजी रहता था 
कुछ गिनी चुनी किताबें थी 
वहाँ मिली मुझे कुछ और किताबें 
जिनमे मुक्तिबोध और अज्ञेय भी थे     
कुछ प्रेमचंद की कहानिया भी थी 

स्कूल मैं कभी जल्दी जाने का मन ना करे 
या कभी जल्दी भाग आओ    
तो वो एक ठिकाना था     
ठंड मैं फौजी कभी-कभी 
क किरोसिन के स्टोव पर चाय बना देता था   

फिर मैं थोड़ा और बड़ा हुआ 
देखा कि वो पास वाली लाइब्रेरी बंद होकर 
कहीँ और चली गई 
एक खुले खूशनुमा कमरे से 
एक बंद जर्जर कमरे मैं 

अब किताबें भी पढ़ने नहीं मिलती थी 
कुछ मेरी ही उम्र के लोग 
हाँ उस लाइब्रेरीनुमा कमरे को 
एक पंचायत घर बना रहे थे 

फिर कुछ और समय के बाद वो लाइब्रेरी 
जो एक चर्च मैं थी 
उसे भी बंद कर दिया गया 
वो किताबें जहां उन्हे होना चाहिए 
वो वहाँ नहीं थी 
मन थोड़ा उदास हो गया 

हमारी मूल भावनाओं के विरुद्ध 
लाइब्रेरी भी ऑटक्रैटिक हो गई है 
लाइब्रेरी का भविष्य वो लिखते थे 
जो किताबें नहीं पढ़ते थे 

कुछ और का जिक्र कभी और     

Sunday, July 11, 2021

गुलामी की परिभाषा


 गुलामी की अलग अलग परिभाषाएं  होती हैं 


कभी गले से निकलती मातम की चीख से कहानी शुरू होती है 

नीले पड़े एक सर्द जिस्म से 

कहानियों के रेतीले बवंडर 

जिन पर बर्फ की चादर चढ़ चुकी है 


जहाँ थमा दिया जाता है अनिश्चितता का प्रकोप 

पुराने लकड़ी और पत्थर के घरों में 

लोग चुनते हैं उम्मीद और 

ललक होती है जिन्दा रहकर 

आज़ादी तलाशने की 


कभी कहानी वहां से शुरू होती है 

जहाँ से ठन्डे नीले आसमान के नीचे 

कुछ बच्चे पुस्तक उठाये 

चीड़ के दरख्तों के नीचे से गुजरते हैं 


तब नहीं सिखाया जाता साम्यवाद या पूंजीवाद 

कुछ प्रकृति को समझने की कोशिश होती है 

उन एब्स्ट्रैक्ट संकेतों से 

पर लोग कुछ सीखते और हैं 

और जकड़ जाते हैं भावनात्मक बेड़ियों में 

निकलने की कोई उम्मीद, कोई गुंजाइश  नहीं होती 

पर ललक होती है जिन्दा रहकर 

आज़ादी तलाशने की 


 एक बार तो कहानी शुरू हुई थी 

एक पथरीली सीढ़ी पर चढ़कर 

जहाँ अनायास ही चढ़ते चढ़ते 

एक पत्थर की सिल्ली पर 

जहाँ से सीढ़ी खिसक चुकी थी 

और आगे कुछ नहीं नहीं दीखता है 


तब सिर्फ खड़े होकर शुन्य को ताकना 

एक विकल्प था 

ऐसी जगहों पर मनुष्य सामान्यतः 

परिस्थितिवश ही पहुँचते हैं 

जहाँ दुनिया को समाज को उम्मीद होती है प्रगति की 

और जीव को ललक होती है जिन्दा रहकर 

आज़ादी तलाशने की 


कुछ कहानियां शुरू होती है विफलता से 

या फिर विलगाव से 

जब एक झरने के किनारे से जाती हुई सड़क पर 

कुछ किताबें पढ़ी जाती हैं 

और अकेले बैठ कर पी जाती है आधा किलो चाय 


चुनाव मुश्किल हो जाता जब सवाल 

निर्वाण और सामृध्य का हो 

ऐसे सवालों पर सबकी नज़र होती है 

कई बार लोग जवाब में बुद्ध भी बन जाते हैं 

शायद मनुष्य को ललक होती है जिन्दा रहकर 

आज़ादी तलाशने की 


कुछ कहानियां शुरू होती हैं 

बस शुरू होने के लिए 

जहाँ सार और प्रासंगिकता का कोई औचित्य नहीं 

परन्तु इसमें समरसता है 


कुछ कहानियों में निंदा है 

कुछ कहानियों में समृद्धि है 

कुछ में अहंकार 

कुछ में ख्याति 

कुछ में अपराध 

तो कुछ में अपराधबोध 

कुछ में अज्ञानता हैं 

तो कुछ में खुशफहमी है बुद्धत्व की 


और ललक है जिन्दा रहकर 

आज़ादी तलाशने की 



Wednesday, June 30, 2021

चुनाव

        बुराँस के ढुलकते छरहरे पेड़ों के बीच 

        तक़रीबन उन्नीस साल पहले एक कच्ची सड़क गुजरती थी 

        उन कच्ची पगडंडियों को,

        और कुछ पुरानी पगडंडिया जोड़ा करती थीं 

        जो तब शायद झाड़ियों से भर चुकी थीं 


        जब एक कॉपी कबाड़ में बेचने के बजाय 

        परीक्षा ख़त्म होने पर उन्हें फाड़कर,

        उनके हवाई जहाज बनाना  

        एक विलासिता थी 

        

        तब कुछ बच्चे उन झाड़ियों से भरी 

        पगडंडियों पर शायद गलती से 

        गुजर जाते थे जिन पर 

        भेड़ और बकरियों की हड्डिया पड़ी होती थीं 

        जैव उपघटन के बाद, शायद उन्हें बाघ ने खाया हो  


        सफर के सबसे अच्छे पड़ावों में 

        शायद साफ़ पानी का एक नल था 

        संस्कृत जो जुड़ा है संस्कृति से 

        वहीं से कुछ श्लोकों  का आविष्कार हुआ होगा 

        जो किसी भी पाठ्य पुस्तक में नहीं थे 

        ज्यादा कहने पर लड़ाई शायद भिक्षुओं और चार्वाकों 

        तक जा सकती है, चलिए आगे बढ़ें

    

        कुछ और बरस पहले वह श्लोक 

        कुछ मुक्ति की बातें पढ़ते थे 

        शायद मोक्ष के परे 

        फिर दूर पहाड़ी से एक बड़ा मैदान 

        दिखता था 

        

        फिर मुक्ति और उक्ति में चुनाव था 

       पर चित्त उनसे भी कुछ अलग सोच सकता है 

        उम्मीद के परे की बात थी 

        तो विचार क्रियांन्वयन पर नहीं गया 

        माया शायद पारिभाषिक रूप से भिन्न थी 

        

        कुछ शब्दों का परिभासन उसके बाद हुवा 

        इसलिए विचारों में 

        अपरिपक्वता हो सकती है 

        

        मनुष्यता या मनुष्यों की मनुष्यता 

        त्रुटिहीनता पर बल देती थी 

        शायद ऐसा मानों सब एक ही 

        तराजू पर तोले जाएँ 


        इस समय चुनाव आसान था 

        अलगाव 

        परन्तु चित्त की दुर्बाता भी हो सकती है 

        कि जब अलगाव चुनने की बात आती है 

        तो सालों बाद मन समर्पण चुनता है 

         

        पर यह सब सिर्फ मनघडंत 

        रूढ़िवादी पुरानी काल्पनिक बातें हैं 

        इसमें कुछ भी निश्छल और निर्बाध नहीं 

        इसको न्यायालय में चुनौती भी दी जा सकती है 

    



        


      

        

Wednesday, November 4, 2020

कुछ मकान

बचपन  में जब में पत्थर के मकान में 
खड़ा होकर पत्थर के मकान देखता था 
तब एक कंक्रीट का मकान मुझे आकर्षित करता था 

वो पुराने पत्थर के मकान,
साल और टीन की छप्पर
बारिश में आवाज़ करते थे 
तब उनकी शायद आदत हो चली थी 

शाम में ढलता सूरज उस बरसात के दिन में 
रात तक आंधी ले आता था 
जब हम घंटो नाले में बहते पानी को देखा करते थे 
खैर अब वहाँ कंक्रीट की पार्किंग है 
हमने घर भी तो सी लिए हैं अपने 

कुछ ऊँचे टीलों में किले बनाने का रिवाज़ था 
कभी लोग लाल रंग के पत्थर का इस्तेमाल करते थे 
तो कभी कुछ भूरे और अन्य रंगो का 
अब वो किले फीके पड़ने लगे हैं 
पर फौज के लिए तब किले नहीं थे 
कंक्रीट और टीन और कुछ परिस्थितियो में साल के छोटे बड़े घर थे 

कुछ लोग तिरपाल के मकानों में रहते थे,
शायब अब भी रहते हैं 
कुछ लोग घास के मकानों में रहते थे, 
जो शायद अब भी रहते हैं 
हाँ एक मकान था, जो शायद अब भी है 
वो सिर्फ टीन का था 
फिर मैंने आसमान को लोगों की छत बनते देखा

क्या मकान भी गमगीन होते हैं 
रंगो की तरह आप उन्हें देख कर
समझ सकते हैं.. शायद  
कुछ मकान जहाँ चेरी के पेड़ थे 
और शायद बनफूल और बनफ़शा भी थे 
उनमे से ज्यादातर मकान बाहर से खुश 
दिखाई पड़ते थे 

तब मैं देखता था अलग अलग तरह के मकानों को 
फिर लोग कहने लगे 
कि कुछ मकानों की 
इ म आई लगती है 
पर शायद उससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि 
लोग मैंने देखा है, चाहे वो कंक्रीट में रहे या घास में 
बारिश में भीगने पहुँच हो जाते हैं  

Tuesday, January 7, 2020

असहमति (Dissent)









शुरू की कुछ रिक्त पंक्तियों के साथ

एक बार, मज़ाक में, मैं एक
दोस्त की ले जाती हुई फाइल पर
चारों कोनो पर स्टेप्लर चलने लगा
सिलने लगा उसे लोहे की पिनो से

मेरा चंचल मन ऐसी हरकते करने को
हमेशा करता है
दूसरों को तंग करने मैं बहुत मजा आता है
लोग इर्रिटेट भी होते हैं

इस बार एक अजीब सा वाकया देखा
एल्वेन बीट्राइस हॉल की एक किताब थी 
द फ्रेंड्स ऑफ वोल्टेयर 
उस  किताब पर एक शख्स 
तीनो कोनो से स्टेपलर लगा रहा था 
क्योंकि एक कोना शायद पहले से सिला था
किताब अपने मूल भाव के आधार पर 
उसे ये स्वतंत्रता देती है 
की वो उस किताब को जलाये 
दरिया में फ़ेंक दे या सुपुर्दे-ए-ख़ाक करे 

पर अजीब तब हुआ 

जब उसकी देखम देख लोगो ने भी 
किताब पर स्टेपलर चलना शुरू कर दिया 
पहले कुछ लोग थे 
फिर अनुयायी 
फिर भीड़ 
और फिर जनता 

हद तो तब हो गयी 

जब लोगों ने, 
उस ना गवार लेखिका 
के  बारे में 
जान्ने वाले लोगों के, 
होठों पर भी 
स्टेप्लर चलने शुरू कर दिए 

Monday, May 27, 2019

शायद मुझे लगा

मैं एक मीनार जो बनाई गई थी
एक आजादी का जश्न मनाने के लिए
इरादे कुछ बदल गए
और बनाई जाने लगी
स्थापत्य की तरह
जो दर्शाती थी
एक शासक का अधिपत्य

शायद  मुझ मीनार को अपने  औचित्य पर
कुछ शंका होने लगी
मुझे लगा  कि मुझे बनाया जाना था
एक विद्रोह के प्रतीक के रूप में
पर मैं तो कुछ और दिख रही हूं

मैं नहीं चाहती कि मुझे
राजतंत्र गणतंत्र या जनतंत्र
 या तानाशाही जैसे महान
संस्थानों से जोड़ कर देखा जाए
मैं नहीं चाहती कि मुझे
साम्यवाद  या पूंजीवाद से
परिभाषित किया जाए

आजादी मानवीय परिभाषा से परे हैं

बेहतर होगा मैं झुक जाती हूं

शायद मुझे लगा

Friday, August 31, 2018

एक पुराना किस्सा



मेरी आधी उम्र से पुराना किस्सा
न छेड़ फिर ज़ालिम
वो वक़्त जब मैं बुराँस के
पेड़ के नीचे खड़ा  होकर
उनके लिए ललकता था
काफलों के लिए ललचाता था
पैदल चल कर कई किलोमीटर स्कूल जाता था

वह पुराना किस्सा
हंसी आती है अब
ऐसे न जाने कितने किस्से आये
और भूली बिसरी यादें
बनकर रह गए

हाँ पर वह भी एक किस्सा था
जिस किस्से का कोई नाम नहीं होता
वह किस्सा आसमानी काला होता है
पत्ते बहुत हरे हुआ करते थे तब
अब तो सिर्फ पीले  दिखते हैं

मेरे पास एक हरे रंग का
हॉफ स्वेटर भी था
मेरी हिंदी तब अच्छी हुवा करती थी
और ठिठकियाँ लेना मेरा शौक हुआ करता था
हंसी तो अब बेमानी सी लगने लगा है

किस्सा बहुत लबा था
ये किस्सा सारे किस्सों में सबसे
ज्यादा मुश्किल भी था
मुझे पिछले बैंच पर बैठने की
आदत सी पड गयी थी

यह एक आँख मिचोली का खेल था
अक्सर मेरी ही नज़रें
ठिठक जाया करती थी
फिर अठखेलियां  मैंने
कई बार सुनी भी
वह अटखेलियां बहुत सी बातें बताती थी
पर हाँ वह मुझे भृमित भी करती थी

किस्सा इतना पुराना है
की इससे ज्यादा मुझे याद नहीं
या फिर इससे भी ज्यादा
मुश्किल किस्से मुझे सता रहे हैं
ए ज़ालिम, इतना पुराना किस्सा मत छेड़
ये मेरी आधी उम्र से भी ज्यादा पुराना है

Monday, August 14, 2017

उद्देश्य की समझ



बात उस दिन की है जब 
जब मैं कुछ पहाडियो के बीच  होकर गुजर रहा था 
ना , वोह पहाड़ियाँ  वोह नहीं थीं जहाँ 
जहाँ मैंने बचपन गुजरा है 
बारिश  अलग अलग फ़वारो में चल रही थी 
ज़्यादातर बदल काले थे 

नयी कोपलें खिल रही थी 
दो पहाडियों के बीच मैं गुजर रहा था 
या शायद मेरे गुजरने का वक़्त हो गया था 

खैर मौसम तो सिर्फ समां बांधने के लिए है 
और मुझे मौसम बयां करते नींद आ रही है 

ऐसे मौसम और एक ख्याल को सोचकर लगा 
लगा के मैं कई जंग  एक साथ जीत सकता हूँ 
यही सोचकर मैं  हमेशा आगे बढ़ता हूँ 
और मैं उस समय यही सोचकर आगे बढ़ा 
की जंग में एक मकसद होता है 
मेरा अस्तित्व मुझे सिर्फ बेवजह रहना सिखाता है 
और मकसद मेरे लिए सिर्फ घातक है 

मकसद उन लोगों के लिए अच्छा है 
जिन्हे उत्पत्ती और उद्देश्य  का ज्ञान है 
मैं निर्मूढ इन बातों से अनजान हूँ 

खैर, इस मौसम में जब मैं जीत  की उम्मीद के साथ आगे बढ़ रहा था
मैं क्षणभर को भूल गया था कि मैं निरा मूर्ख हूँ
मैं यही समझकर कुछ तर्क करने लगा
मैं तर्क युद्धों में हमेशा हार ही जाता हूँ
और उछाल के आकर्षण में गर्द में मिल जाता हूँ

मैं इस निष्कर्ष पर बार-बार पहुंचता हूँ कि
मुझे ज्ञान की बातें नहीं करनी चाहिए
पर  यह बात भी सीख  गया तो मैं
फिर इस तर्क वितर्क के चक्रव्युह में फँस जाऊँगा
न मुझे  ज्ञान चाहिए न उद्देश्य की समझ   

Tuesday, August 1, 2017

बुनियादी बातें


कुछ बुनियादी बातें मुझे समझ नहीं आती
कुछ बुनियादी सवालो से मैं अनजाना हूँ

बात तब की है जब में कुछ सवाल सोच रहा था
क्योंकि जवाबो की परवाह नहीं मुझे
जवाब मुझे एक निष्कर्ष पर ले जाते हैं 
जो शायद किसी दृष्टिकोण पर बने हैं

सवाल साधारण था, की भ्रष्ट कौन है
जवाब दहला देने वाला था
जनता, जो सबसे ज्यादा पीड़ित है
वही सबसे ज्यादा भ्रष्ट है

भ्रष्ट होना लोगों को गंवांरा नहीं
परन्तु वही अगर विकार में बदल जाए
तो शायद मनुष्य उसे स्वीकार कर लेता है
लालच से, भय से
या किसी अन्य भावना से
अभी भावनाओं पर लिखना मुश्किल है

मैं उन सभी स्मिर्तियों को
अपने मानस पटल से विलुप्त करना चाहता हूँ
जो मुझे जवाब देती है एक दृश्टिकोण से
मुझे सिर्फ सवाल चाहिए, अनकहे,  अनसुलझे 

Monday, July 25, 2011

एक और सच

एक नन्ही सी लड़की
कुछ फूल लेकर दरगाह पर पहुंची
चाहत के आगे मजबूर थी
पर मजबूरी थी की उसे फूल नहीं मिले

कुछ रंगीन कागजों को मोड़कर
कुछ सुन्दर फूल बनाये थे उसने
फूलों बनाने की सीख उसे शायद
बचपन के किसी दोस्त से मिली है

वो क्या असमंजस में थी?
मन्नत मंगनी है, या बस पूजा करनी है
पता नहीं, फिर भी उसने क्यों
कचरे के ढेर से कुछ कागज़ बीने थे

खुसबू के लिए उसने कुछ अजीब किया
कुछ मील चली भूखी प्यासी
ढेरों मन जब पसीना निकला
तो उसने पसीने से फूलों को भिगो दिया

पीर तो खुश हुव़े क्योंकि
उन्हें प्यार नज़र आया था पसीने में भी
पर कुछ बुत्परास्तों को
नयी चीज़ें रास नहीं आती

लड़की को पहले फर्क नहीं पड़ा
हौसला बहुत है उसमे
यही सोच कर दांव खेल गयी
पर भगवान भी तो गलत हिसाब लगते हैं

पीर ने कुछ कहा उसे, कुछ ऐसा
जो हम सिर्फ दर्द और डर में कहते हैं
पीर ने शर्ते रखी
शर्ते भी बहुत अजीब सी थी

"वक़्त के हर पहर,
सिर्फ तुम्हे मेरा ख्याल होगा
तुम मेरे पास अकेले आओगी
और फूल थोड़े सादे होने चाहिए

मैं सर्वशक्तिमान हूँ, तुम तुछ जीव हो
मैं ऋतू हूँ तुम सिर्फ शीत हो
मैं इच्छित हूँ तुम बेचारी इच्छा हो
मैं तीनो लोकों में हूँ तुम सिर्फ अधर में हो"

ऐसा नहीं की लड़की भी निर्दोष थी
उसने भी अपने सपने और सपनो के सपने
उस दढ़ियल बूढ़े पीर के सामने
बड़ी नजाकत से रखने शुरू किये

आसक्ति का विश्वास से कोई रिश्ता नहीं होता
पर ये बात तो ना पीर समझ पाया था न लड़की
दोंनो को दोनों पर सब कुछ था
विश्वास भी और आसक्ति भी

फिर कुछ धर्मगुरु आये
पर दुनिया में किन्ही भी दो
गुरु का दर्शन एक सा नहीं होता
फिर विवाद शुरू होते हैं

दोनों बेफिक्र रहे
बातें बनती थी फिर बिगड़ जाती थी
कहाँ गड़बड़ हवी किसी को नहीं पता था
फिर कुछ मूर्तियों ने आंसू भी बहाए

पर ये सिलसिले चलते रहते हैं
और ज्यादा बाढ़ में शायद कारवां भी डूब जाए



Sunday, June 26, 2011

हमे नहीं पता

शुरवात थी कुछ इनओर्गानिक फूलों से
वो दौड़ कर लिपट जाना गवाह था मोहब्बत का
इक गाडी वाला जोर से होर्न बजाकर निकल लिया
बोला हटो रस्ते से, ये नैवद्य था

कुछ हज़ार किस और कुछ सर्द दिन
इस बार दिन तनहा नहीं थे
आइना साफ़ था और पूरा भी था
लाशें अब जल चुकी हैं

" कोई तो रोक लो" कहाँ से आया है
पर दिन कभी ख़त्म नहीं हुआ
सादगी अब थोड़ी
बेमानीसी सी लगने लगी थी

उसने मुझे फिर मेहँदी में
मेरा नाम ढूँढने को बोला
पर गहरे गीले हरे रंग की खुसबू में
मैं अपना अस्तित्व खो बैठा

एक रेलिंग पर दो लटके हाथ
एक दुसरे को कचोट रहे थे
वो स्पर्स केवल दोनों का नहीं था
किसी और ने भी उसे महसूस किया था

तभी एक नन्ही लड़की कुछ इतरा के
ऊँगली और उन्गूठे से जीरो बनाकर बोली
दीदी मेहँदी अच्छी लग रही है
पर मतलब कुछ और था उसका

एक खूसट बूढा, जो शायद
उस मासूम लड़की का चाचा था
शकल बना कर देखने लगा
और गुलाबी लड़की हंस पड़ी

कई जबानो में जबानें की गयी
ईमान डोले मगर
शायद फिर ईमान बेईमानी निकले
प्यार में ईमान बेमतलब हैं

कुछ ही तीर तरकश से निकले
बाकी तीर खली गए
तरकश मचलता रहा
और निशाना अटखेलियाँ करता था

एक सुबह आलू पराठे की थी
तो बाकी सिर्फ चाय पर निकल गयी
कुछ समोसे खाए और बाकी भूख, हा !!!!
सोच लो खुसबू और भूख में क्या बड़ा है

एक बुद्ध मंदिर, जो वहां हमेशा था
पर ढलान पर दौड़ना नया था
नाव के चप्पू के साथ मछलियों की अटखेलियाँ
और कुछ नीली चूड़ियों की खनक भी थी

मौसम में मौसिदगी
और कुछ रेशम सी चमक
शायद यह रंग उतरेगा नहीं
और हाँ यह कुछ समय में और गहरा गया है

कौन पानी में देर तक रह सकता है
किसको ठण्ड कम लगती है
कुछ और आज्मयिशे थी
पर साला, फोटोग्राफर बड़ा चालू था

ठंडी बारिश , वो भी रात की
सावन का पहला फवारा साथ में
सर्द आहें, और जुकाम
पर अफ़सोस में खांसी नहीं बाँट पाया

एक नन्ही लड़की रो रही थी
पर शायद रंगीन परी को
उस पर प्यार आ गया, और बोली
में इसे गोद में ले लूं

उछलते हुवे चलकर थोडा
सावधानी बरतनी चाहिए
फिर पीछे से नाम लेकर अगर पुकारे कोई
तो चोर को चुप रहना चाहिए

पर पकडम- पकड़ाई का खेल
केवल चोर पोलिसे ही नहीं खेलते
कुछ लोगों के आशियाने
ज्यादा मचलते हैं, और फिर आग लगती है

चेहरा गुलाबी था, कपडे भी और टोपी भी
गुलाबी ही खरीदे गए
पर हया का रंग कुछ भी हो
वो नीला नहीं होता

चोकलेट ढूँढने की कोशिश थी
पर स्ट्राऔबरी ही मिला,
पर सच बताओ वोह भी
बहुत अच्छा लगा

फिर क्या था, एक किताब में कसमें
या कसमों की किताब, कुछ रुआंसी आँखें
और ज्यादा ही देख लिया है हमने
ज्ञान ज्यादा हो गया अब

Tuesday, September 7, 2010

Petrificus Totalus

Its a story never supposed to have written because of its dire consequences. Its is a story when I ( to be specific my physical and mental self) was completely captured by my own dreams: entangled, slaved and maligned.

It started with a fine day. I took breakfast, watched some cartoons, and I have to leave for office at 1400hrs. I was slightly exhausted may be due to lack of sleep but I never intended to. I strolled a little, loitered in my balcony.

Instantly I felt to lie down on my shabby pallet. I slept and again wake up for pissing with a conscious attention of getting slept and wake up again.

My docile self (which is almost all of me) was so anxious to give up to whatever may capture it, but I don't. I slept.

When I wake up I tried to move my hands as fast as I could as I have to leave for the office. But something or may be whole of me was petrified. I wasn't able to move. I was only thinking that I had to leave to office. My mind had picked up a fight with itself. A part of my social sense wanted me to make me stand up but something was keeping me prostrate. I tried to pinch my self to check the reality of the event but my hands were unable to move too far. I pushed the bed with my hands to lever myself up to get down off the bed or to roll aside but the effort turned out to be macabre.

I heard the horn of the taxi that used to take me to the office. I wanted to resist again to my own self. I tried to separate my physical sense from my inner self so that the brawl could sooner be over and I might conquer and prepare my self for the battles of society. I completely wanted to indulge myself into the lustfulness of the world but my senses were not allowing me. Finally, after sometimes I heard the car leaving. But a flail being couldn't help himself.

As I forgot my cell phone somewhere therefore no one was able to contact me. Soon after people tried to search for me. I sleeps naked, without underwear, beneath a blanket where lies new possibilities, the ones that should not be explored in public. Whatever, I felt completely numb. Two of my friend came in from the balcony they saw me lying, I wanted to explain that I couldn't have come to the office because I had a paralysis attack.

That was the first time I understood the severity of my demise when I used the world paralysis in my own mind. I wanted to share it with the angels but I wasn't able to move my lips. I couldn't even deciphered their words. I could only see that they were coming for me. They hold me but I could only respond from the movement of my eyes and even that was very tough. As my room was shabby they called two maids to get it cleaned. Then few more people came and inserted some needles in me. I turned dead. When I wake up again my hands were able to move but with lots of effort. Two of my friends were near me, they supported me to the bathroom. I took bath nude in front of the two ladies and some men. No feeling of remorse or shame ever occurred to me. I was so numb that I couldn't even enjoyed the warmth of the liquid supposed to be water. I can't even have deciphered the nature of that lively substance. The aroma was without any noxious or sweet smell. It may be the effect of numbness or may water really don't have smell.I confirmed it by pissing synchronously. I found a little faint smell into my nose and I finally realized that pure water doesn't actually possess it up to the nuances of my senses.

They all were looking at me with something. Maybe hatred or maybe pity. Whatever, nothing occurred to me at that time. They were running like wild hogs to their predators to give a finally resistance. But I had to be prey and I might have used the wrong metaphor, Whatever, I knew I was going down may be deep down to the darkness of the tough sweet sense arising form a trough in which one needs virile attitude to achieve salvation.

But I was taken away from my path to social salvation. I was physically challenged and mentally retarded. They decided to take me to an asylum. Whatever. An ambulance came down to fetch me. I was more or less dressed like a girl ready for orgasm in her night full suit. The aegis of good job and secured life provided by a Public Service was long gone. My family was called to see my last unassuming looks. I yelled nothing, yearned for nothing. All the fancies of getting something was annihilated.

Finally I saw a white pen with carved pink flower, that still says the story of my desires and whims, kept on my window, which only lingers to the memory.

Monday, February 22, 2010

आसक्ति

काला रंग पहने,
चकतों के शहर से निकल पड़ा ,
एक यायावर
हाँ चकते काले रंग में दिखाई नहीं देते

लाल रंग लपेटना,
लाल रंग ओढना,
लाल रंग में सिमटना,
लाल रंग में नहाना,
और शायद पहना हुआ लाल रंग भी
उस यायावर को ख़राब लगता था
या शायद वोह
लाल रंग का औचित्य ही नहीं समझ सकता था

तीन भाषाओँ या शायद चार
तीस या शायद इकत्तीस बोलियों के बीच
(हाँ क्योंकि दुनिया में आखिरी मायने नहीं रखते
इसलिए मैं भूल रहा हूँ )
हाँ, उनके बीच लाल रंग का एक फूल
उन चार भाषाओँ और इकत्तीस बोलियों से
बेखबर, खुमारी में डूबा हुआ
शायद प्रारब्ध यानी यायावर का इंतजार कर रहा था


इतने भीड़
बोलियों और भाषाओं की
और उसमे उत्सुकता
शायद थोड़ी जिज्ञासा

पर यायावर वातावरण को कहाँ समझ पाते हैं
वैसे भी पुरवाई तो
फूल के लिए उमंग लेकर आती है
पर यायावर तो श्रौत का पता लगाते हैं

वो यायावर श्रुति के मनम में ऐसे खोया
था की उसकी तन्द्रा कभी ना टूटेगी
पर.......
पर फूल लाल रंग में
लिपटा, सिमटा ढका और नहाया हुआ वो फूल
शायर गुलाब ही था,
पर यायावर को वो कुछ और ही लगा,
(वो चकतों का शहर फूलो की घाटी था )
फूल में आकर्षण तो था
पर यायावर काला कपडा पहने
भाषाओँ और बोलियों के क्षीण होने का इंतजार कर रहा था

लाल रंग का आकर्षण
भले ही देर में असर करता हो
पर असरदार तो होता है

यायावर ठिकाना ढूढने लगता है
यही तोह लाल रंग है

पर मुझे उसने धोखा दिया है
और में कविता से बोर हो जाता हूँ

Wednesday, January 13, 2010

होमोसेपियेंस

दो जोड़ी जूते और आठ बदबूदार मौजे
दो फटे जींस और कुछ पुल्लोवर्स
आवारा, बेकार, बदबूदार और अपने में खोये दो लोग
एक क्रिकेट ग्राउंड और एक बाईक
कुछ मंदिर और बाकी आलू पराठे

कुछ किलोमीटर और गुदी हवी चट्टानें
ठंडी हवा और तेज धुप

कितने अलफ़ाज़ और कितने अंजाम
तन्मयता से धुप में बैठकर
कुछ सिगरेट सुलगाने से अंतर का पता चलता है

एक ही कंपनी की दो अलग किस्मो की सिगरेट पीने वाले दो बोर
हनी डीयू का रेहेस्य खोल रहे थे
पर उनका उत्साह तो देखिये घंटो बैठकर
ताके जा रहे थे न एक दुसरे को न शून्य को
सिर्फ सड़क को, या वहां से गुजरने वाली गाडी के नम्बरों को

फिर कुछ सर्द रातें और कुछ ठन्डे पथरीले जाम
दो रम के क्वाटर और चार व्हिस्की की बोतलें
ठण्ड में ठन्डे दो कम्बल ऊपर और एक नीचे

पर ठण्ड ज्यादा है
आखिर
क्या सिर्फ होमो, सेपिएन्स होते हैं ?
पर बड़ा सवाल है क्यों?

Saturday, October 24, 2009

CHOICE OF COLORS

ADOLESCENCE OF A FATHER:

Hey almighty God, I have a sweet child born on the eve of new year. You know how cold the weather is. Just imagine how hard to take a conceived woman woman to a maternity hospital. An then you betrayed me after so much effort of mine. 'She turned out to be a girl'. What the hell it is.
but I believe in you, oh Mighty lord!.

I loved that gift of yours being oblivious to my own child. I caressed her even at her nuisance. She wept whenever I hold her, she pissed at my new trousers when I just had had my ablutions she made faces to me when I was happy, I got no solitude when I was harassed by the evilness of this world. I had lost the smell of odor of her mother cause we were to share the bed.

But what I gained was the pleasure of being a father. The father of a charming, sweet, beautiful and arrogant child. The child which used to love its father. I wants it to be same for the rest of my life. But I don't know why you have created devils. She just started believing in the Devil at an instance of space. She bend the general laws of physics. She started bending a 2'' thick solid iron rod with her delicate but nimble hands.

She started worships at midnight. She used to outsmart the crooks. Once she took some money out of a Don as extortion by kidnapping her daughter. She told me that she don't do it for money. But the hell with that. The point is she did it. haauffffffffff.

Oh my sweet lord this child is going out to devil, and now the devil has taken a form of a boy who I don't say exploits her but the case is reversed she is exploiting him. She is my sweet child which I have nurtured with great care and protection. I don't know what is the best possible way to get in to her dreams again.

But can't leave her just like that for committing such high degree crimes. I want to stop her but she didn't listen to me I scolded her but she is just numb. I want to kill her but she feels no pain no remorse. Oh dear God! please bring my child to me.

And if the devil you have her possessed then Oh dear Devil! please bring my child to me.

And my honour to the world.

NUMBNESS OF A CHILD:

Oh Devil! you know how much I have loved my father. I don't remember the days before which my memory started, but the memory of the scent of my father still remains in my lungs. I can't recall his expressions but I still have the noble and gentle touch of him in my skin and the firmness of his embraces in my blood. The sweet words are hardest to remember but the sweetness is unforgettable.

Then I got older he brought stuffs for me. May be not from father's affection but may be from obligations of a father. he called me almost always in the most ruthless manners but I adopted his demeanor as my identity. His slangs at others made me laugh and I cherished him as always.

Then, when I got senses, I started feeling nothing for him and then a vacuum was created in the vicinity of the egg in which I live. The yoke of the ellipse started getting paler and I found the pungent and aromatic odor as useless. I got immobilized. The numbness haunted me. The adolescent child has become white from blue.

Then the devil you came in. As the destiny of the colors every girl has to get pink. But for me it was mingled with the reddish aggravation and brownish hollowness. The color of being nothing or maybe something that I can't define haunted me. I started doing this and that is what matters.

The taste of cocaine can elate any one to you. I anticipated that. My father said that I am condescending but I was baffled. My desire of no need and no want would have done that. But to get a deep pink I did all what I should have ashamed off. He told me that I am converting to deep purple. The shame had left me years ago. The pleasure had over powered it. Oh devil you relished me.

But my father is upset not because of vacuum but because of the vulnerable air the has sucked. He wanted me to be the slave of vacuum but the vacuum became my slave and now the smoke of morphine can soothe it.

Oh Devil and oh Father, Leave me to me. (She uttered it as plea but without please)

Oh God please leave me to me. ( In a sound of comfort and no respect)

THE GUILTY ALMIGHTY:

I can be the Devil or the God, but it doesn't matter to me. I don't create rules. I just intervene in them. I am no good to be the one to solve your problems I just want to make father saffron and the girl pink. but they chose the colors of red and blue. I am nobody.

Even I love pleasure. The pleasure of being with someone whom I can master. Even they want so and that is why they I pleading me. But I know that they shouldn't, even they know they shouldn't. But the colors are too hard to ignore.

Colors have long ago eroded my skin my mind and now its eroding my comfort. But even being an outsider I love pleasure and true pleasure is obtained from our own choices. If choices change, the environment has to modify itself. The desires must be rectified.

I can't do anything because one must fight for his own choices.

Oh father oh Daughter " I am you, cause existence is limited by our own self."

Give me the toast of blood.

Friday, October 23, 2009

तितलियाँ और इच्छाए

एक गुलाबी तितली
लाल नसों वाली
प्यार से एक बाग़ में उड़ रही थी

मत सोचो की वो अकेली थी उसके
साथ कुछ नीली पंखो वाली और बहुत सी
तितलियाँ भी पराग की तलाश में
फूल छान रही थी

मुझे ( जाहिर सी बात है)
सिर्फ़ गुलाबी तितली ही दिखाई दी
तितली ने मुझे भाव विभोर कर दिया
पर शायद भावुक नही

मैं फिर से ये सोचने लगा
की इस तितली के पीछे भागो या नही
बड़े काम है मुझे
हाँ सो तोह है

मुझे बचपन से ही
रंगीन तितलियाँ पकड़ने का शौक है
उन्हें देख कर मैं
स्कूल जाना भूल जाता था

एक बार एक कागज का
प्लेन उडा रहा था
उससे एक तितली की मौत हो गई
दोस्तों ने कहा तू रोया क्यों नही
मैंने कहा था मुझे दुःख नही होता

फिर क्यों अचानक एक दिन जब एक बड़े से
ट्रक ने एक नीली तितली को कुचला तोह मुझे दुःख क्यों हुआ

मैंने जब सिंहावलोकन किया तोह पाया
की मैं नेपथ्य मैं गुलाबी तितली का करहना सुन रहा था

पर अब यह संगीत भी ओझल होता दिखाई देता है
क्योंकि मेरी इच्छाएं मुझे तित्लीयों के पीछे भागने से रोकती है

मुझे क्या चाहिए यह तोह नही पता पर हाँ
तितलियों का आकर्षण मुझे बाग़ मैं घुमा ही देता है

पर सच नही पता मुझे
की मैं क्या चाहता हूँ

तितलियाँ ही इच्छाएं है
या तितलियों ने इच्छाओ को मार कर
उनका आवरण धारण किया है

क्या फर्क पड़ता है
मुझे तोह सिर्फ़ खुशी चाहिए ना?????????

Wednesday, October 14, 2009

सपने और अस्तित्व

कल रात
मुझे बहुत ज्यादा भूख लगी
परेशानी ने हद कर डाली

कुछ ढूँढा पर खाना तोह
जैसे यहाँ दुर्लभ ही है

पर फिर मुझे याद आया की
मेरे पास कुछ धुवें की डंडियाँ पड़ी है
उनमे से एक उठा ली और जला ली

भूख बहुत जल्दी ही शांत हो गयी
पर शायाद कुदरत और ही कुछ चाहती थी
पर थोडी ही देर बाद
मुझे और भोख लगी,

लगता है प्रकृति को पता है शैतान कैसे बनाये जाते हैं
पर में तोह इस सच से बेजार था

क्या करता सोचा इससे काम नही बनने वाला
तोह सोचा क्या किया जाए
शायद समय ज्यादा हो और नींद ना आती हो
तोह इंसान पागल हो जाए
नही शायद ही इंसान नही जानवर भी

पर हल तोह आवश्यक सा था
सो नींद लाने की कोशिश में खुली आंखों से
एक सपना देखना चालू किया

सपने में वोह सब मुझे मिल सकता था
जो कभी इच्छित था
यह प्रयत्न भी विफल रहा
और मुझे ना नींद आई ना ही क्षुंधा शांत हुई

पर पता नही क्या हुवा जब सुबह

मेरे अलारम ने मेरी नींद खोली
तोह समझ आया की
मैंने एक सपने में सपना देखा
जिसमे में वोह नही देख पाया
जो मुझे सपने में देखना था

मैंने वोह नही देखा
जो मैं अपने लिए अच्छा समझता था
मैंने वोह देखा जो मेरे लिए सबसे अच्छा हो सकता था
पर सपने का सपना तोह सपना ही है ना

शायद आस्तित्व हमारे निमित्त को आरक्षित कर देता हें
और निमित्त सपनो को

Tuesday, September 22, 2009

जंगली की कहानी

एक जंगली की कहानी सुनाता हूँ
थोडी बड़ी है

जंगल में जहाँ शेर भालू
और चीते रहते हैं
जहाँ कबाड़ भी नही होता
सिर्फ़ घास और पत्थर होते है, वहां
एक जंगली रहा करता था

उस जंगली ने, अकेले ही
उनके साथ रहने की आदत डाल ली

पर अचानक से वो अँधा हो गया
सोचो एक अकेला इंसान
अँधा पर अकेला
और सबसे, सबसे जरूरी जंगली

उसने हाथ से ढूंढ कर कुछ घास खायी
और जब उसके हाथ पर कुछ गर्मी का एहसास हुआ
तो उसने आग की खोज भी कर डाली
पर ऐसे जंगली कम ही तो होते हैं


उसने पत्थर, घास और आग,
और बहुत सारी और चीजे,
जिन पर उसे विश्वास था
कबाड़ को छोड़ कर
क्योंकि जंगल में कबाड़ नही होता
उन्हें जोड़ कर एक टाइम मशीन बनाई

वो फिर उस टाइम मशीन से इंसानों
के बीच आ पहुँचा

पर फितरत से मजबूर वो
जंगली, यहाँ भी ...
क्योंकि उसे सिर्फ़ अपने कायदों
पर विश्वास था
उन भूखे लोगों को
जो सिर्फ़ दिल पर एतबार करते है
या कम से कम दिखाते तो हैं

उन लोगो के ईश्वर को त्याग कर
अंगीठी में कोयला डाल कर
एक स्याह रात में सर्दी में बेठा रहा
सोचता था की उसे किसी ने बताया है की
यहाँ लोग प्यार भी कर सकते हैं

उस भूलावे में वो आ गया
पर वो जंगली फितरत से मजबूर
दिमाग पर ज्यादा भारोसा करता था
यहाँ भी....
हाँ यहाँ भी उसने मजे से जिन्दा
रहने का तरीका निकाला ही लिया

और उन सारे इंसानों से आगे निकल गया
जो कबाड़ में, भगवन में, और प्यार में विश्वास करते थे
पर टाइम मशीन पर नही
क्योंकि टाइम मशीन तो जंगली ने बनाई ना

वो जंगली ना न्यूटन था ना आइनस्टाइन था ना मैं

वो तो बुध, महात्मा गाँधी और मैं थे......

Sunday, September 6, 2009

एक सहर

कुत्तों के शहर में इंसान
कुछ आपके जैसे, बाकी मेरे जैसे

याद रखिये ये एक साम्यवादी कहता है
क्योंकि कुत्तों और इंसानों में सिर्फ़ उसे ही फर्क पता है
अवसरवादी और पर्यावरणविद तो दोनों में
फर्क ही नही जानते

एक बार एक इंसान की लाश को
कुत्तों के एक मशहूर ड्राईवर ने कुचल डाला
उस पर केस चला, लाश को कुचलने का
हाँ, कुत्तों के लिए इंसान तो लाश ही है ना

जज ने कहा, क्या बेटा ज्यादा पिए थे क्या
वो तो कोई नही
पर तुमने लाश को बाकी इंसानों के
खाने के लिए क्यों छोड़ दिया
डर नही लगता सड़ती इंसानों की लाशें देखने में

फिर वो कुत्ता उस लाश के बारे में सोचने लगा

की उस इंसान की अंतडियां बाहर आकर
निशाचरों को निमंत्रण दे रहे थी
वो शायद उनके डिनर का समय था

एक चीले ने धीरे से दाहिने आँख निकली और हवा में ले उडी
तभी एक बिल्ली जिसने पहले खून नही चखा था
ना जाने कहाँ से आई और पेट के ठीक नीचे से अपना
हिस्सा निकाल कर ले गई

असली काम एक नरभक्षी बन्दर ने किया,
जो भूख से बेबस हो कर कपाल को नारियल की
तरह फोड़ने लगा
और फिर जिस पर इंसान को नाज़ है
उसका वही अंग लेकर वहां खाने लगा

पर कुत्तों के समाज में भी तो तिरिष्क्रित कुत्ते
होते ही हैं
एक ऐसी ही कुतिया आई और उसने जो विभत्सता दिखाई
उसे सोच कर वो अपराधी भी दंग रह गया
उसने इंसान के दिल के टुकड़े किए
खून पिया और
और फिर आसमान की तरफ़ देख कर
अपनी ही बोली में रोने लगी

शायद कहती थी की पैगंबर
अपने बाशिंदों को भेज इस इंसान का बचा
शरीर खाने को

आख़िर कुत्तों के समाज में जहाँ
इन्सान रहते हैं
कुछ आपके जैसे, बाकी मेरे जैसे
वहां भी कुत्तो के दिल में भावनाए तो होती ही है

यही सोच कर उस जालिम ड्राईवर ने
सबके सामने कोर्ट में माफ़ी मांगी